Editorial

अजंता गुहा चित्र

भारत में खजुराहो, कोणार्क, दक्षिणी मंदिर, अजिता एलोरा, मार्कंडा, ऐसी इरोटिक मूर्तियों में समृद्ध हैं। भारत में ऐसी मूर्तियों के निर्माण के पीछे क्या कारण हैं, जहाँ सार्वजनिक रूप से कामुकता के बारे में बात करना मना है? इसके पीछे क्या मानसिकता है? मैं यह जानने के लिए उत्सुक था कि ऐसी पेंटिंग्स, मूर्ति को देखने के लिए समाज का क्या नजरिया है? इन चित्रों को चित्रित करने वाले चित्रकारों की दृष्टि और मानसिकता क्या रही होगी एक स्वाभाविक प्रश्न आया। इन मूर्तियों का समाज पर क्या प्रभाव होगा और इसका महत्व क्या होगा जैसे प्रश्न आपको नहीं पड़ते ।

भरतमुनि की नाट्यशात्र एक श्लोक में भारतीय रेखा, रंग, अनुपात, भारतीय स्थान, भेद, वातावरण और भारतीय सौंदर्य, इसका वर्णन आता है इसके निर्माण का कारण और इससे उत्पन्न सौंदर्य, चित्रकला की मानसिकता का अध्ययन करना महत्वपूर्ण है। एक चित्रशिल्प को कलाकार की मानसिक स्थिति का प्रतिमान कहा जाता है। सिगमैन फ्रायड की ड्रीम इंटरप्रिटेशन लियोनार्डो दा विंची को समलैंगिक के रूप में वर्णित करती है, और उनका कहना है कि 'प्रजनन जानवरों में एक प्राकृतिक प्रवृत्ति है। यह मनुष्यों में भी होना लाजिमी है। उसके लिए यौन आकर्षण स्वाभाविक रूप से हर व्यक्ति में मौजूद होता है। यदि ऐसा यौन आकर्षण किसी कारण से व्यक्त नहीं किया जा सकता है, तो यह मनुष्य के व्यवहार पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। आज भी हमारा समाज उस कला कृति के बारे में खुलकर बात करने से परहेज करता है जिसमें 'शृंगार '(इरोटिक) या 'काम' का विषय शामिल है। क्या राज होगा? कलाकार की अनिश्चित कृतियों के पीछे क्या प्रेरणा होगी? कोई कितना भी नाम दे दे, दुनिया के कोने-कोने में ऐसी कला कृतियाँ बनती रहती हैं। कामुक कला की परिभाषा व्यक्ति पुरक हो सकती है क्योंकि यह संदर्भ पर निर्भर है, क्योंकि कामुक क्या है? और कला क्या है?, इसकी धारणा भिन्न होती है। कुछ संस्कृतियों में एक लिंग की मूर्ति को अत्यधिक कामुक के बजाय शक्ति का एक पारंपरिक प्रतीक माना जा सकता है। यौन शिक्षा को दर्शाने के लिए बनाई गई सामग्री को अन्य लोग अनुचित रूप से कामुक मान सकते हैं।